Karak in Hindi – कारक की परिभाषा, भेद एवं उदाहरण

Karak in hindi
Karak in hindi

कारक की परिभाषा

हिन्दी व्याकरण में कारक एक महत्वपूर्ण विषय होता है। सरल शब्दों में कारक का अर्थ होता है, क्रिया को करने वाला। व्याकरण की दृष्टि से कारक की परिभाषा इस प्रकार होती है कि, “किसी भी वाक्य में, संज्ञा या सर्वनाम शब्दों के जिस रुप से, उनका क्रिया के या वाक्य में प्रयुक्त अन्य शब्दों के साथ संबंध निश्चित होता है, उन्हें कारक कहते हैं।”

इसे और अधिक बेहतर तरीके से समझने के लिए पहले इन वाक्यों को ध्यान से पढ़िए,

1 श्रीकृष्ण ने गीता का उपदेश दिया था।

2 गौतम बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ।

3 श्रीराम के तीन भाई थे।

4 मोनिका का हाथ फ्रेक्चर हो गया है।

5 राहुल ने दीपक से पैसे उधार लिए।

6 हे पार्थ, तुम युद्ध करो।

7 पिताजी ने राहुल के लिए खिलौने लाएं।

इन सभी वाक्यों में, संज्ञा या सर्वनाम शब्दों के आगे क्रमशः ने, को, के, का, से, हे और के लिए ये विभक्ती चिन्ह लगे हुए हैं, जिनसे वाक्यों के अर्थ स्पष्ट रूप से समझ में आ रहे हैं। यदि इन वाक्यों में से इन विभक्ति चिन्हों को हटा दिया जाए तो वाक्य अधूरा और अस्पष्ट लगेगा। जैसे पहले वाक्य को यदि इस प्रकार लिखा जाए कि,

” श्रीकृष्ण गीता का उपदेश दिया था।”

यहां ने इस विभक्ति चिह्न के हट जाने से वाक्य अस्पष्ट लगता है। इन सभी चिन्हों को कारकों के चिन्ह कहा जाता है। इन्हें कारकों की विभक्तियां भी कहते हैं।

इन कारक चिन्हों के विषय में और अधिक जानने के लिए पहले हम कारक के भेद जान लेते हैं।

कारक के भेद

कारक के आठ भेद होते हैं, जो इस प्रकार है,

1 कर्ता

2 कर्म

3 करण

4 संप्रदान

5 अपादान

6 अधिकरण

7 संबंध

8 संबोधन

अब हम, कारक के इन सभी प्रकारों के विभक्ति चिह्न भी देखते हैं। इसके पहले जान लेते हैं कि विभक्ति चिह्न किसे कहते हैं। तो वाक्य में प्रयुक्त, संज्ञा या सर्वनाम शब्दों के साथ जिन चिन्हों का प्रयोग होता है, उन्हें विभक्ति या विभक्ति चिह्न कहते हैं। इन्हें ही परसर्ग भी कहा जाता है। कारक के प्रत्येक भेद का अपना विभक्ति चिह्न या परसर्ग होता है।

जैसे,

कर्ता का विभक्ति चिह्न होता है- ने, इसी तरह कर्म का- को, करण का -से, संप्रदान का- के लिए, अपादान का- से (अलग होना) अधिकरण का- में, पर  , संबंध का – का, की, के, और संबोधन का कारक चिह्न होता है, हे, अरे।

अब हम एक एक करके, कारक के इन सभी भेदों के विषय में जानते हैं।

कर्ता कारक

कर्ता का अर्थ होता है, करने वाला। किसी भी वाक्य में, जिन शब्दों से क्रिया को करने वाले यानी कि कर्ता का बोध होता है,  उसे कर्ता कारक कहते हैं। इसे हम उदाहरण के द्वारा समझते हैं।

“संदीप ने चाय का कप धो कर रखा।”

इस वाक्य में, धो कर रखा एक क्रिया है, और इसे करने वाला अर्थात कर्ता संदीप है। अब यहां पर संदीप कर्ता है, इसका बोध कराने वाला शब्द है, “ने”। ने शब्द से ये स्पष्ट हो रहा है कि कप संदीप ने धोकर रखा है। इसलिए कर्ता का बोध कराने वाले, “ने” कारक चिह्न को कर्ता कारक कहते हैं। यदि फिर भी आपको वाक्य में कर्ता कारक को पहचानने में मुश्किल हो रही हो, तो आप इसी वाक्य को, एक प्रश्न के रुप में पढ़कर देखिए, जैसे किसने चाय का कप धोकर रखा? यानी कि धोकर जो एक क्रिया है वो किसने की, तो आपको उत्तर मिलेगा संदीप ने। तो यहां संदीप एक कर्ता हुआ जिसका बोध हो रहा है ने इस कारक चिह्न से।

कर्ता कारक के कुछ और उदाहरण देखते हैं,

1 सुरेश ने पत्र लिखा।

2 तबला वादक ने तबला बजाया।

3 कृष्ण ने बांसूरी बजाई।

4 अध्यापक ने राजू को शाबाशी दी।

5 मीना ने कहानी पढ़ी।

इन सभी वाक्यों में ने परसर्ग या कारक चिह्न से कर्ता का बोध हो रहा है, इसलिए इन सभी वाक्यों में ने यह

कर्म कारक

किसी भी वाक्य में, शब्द के जिस रुप पर यानी कि संज्ञा या सर्वनाम शब्द के जिस रुप पर क्रिया का प्रभाव पड़ता है, उसे कर्मकारक क्रिया कहते हैं। कर्म के साथ को यह विभक्ति चिह्न आता है। हालांकि कई बार वाक्य में इस विभक्ति चिह्न का उपयोग नहीं भी होता है। आइए कुछ उदाहरण देखते हैं।

1 पिताजी ने मनोज को डांटा।

2 रमेश ने सुरेश को समझाया।

3 मां राधिका को कहानी सुना रही है।

4 आदित्य ने अपने दोस्तों को पार्टी दी।

5 नीलम ने दिए को जलाया।

को, यह विभक्ति चिह्न हमेशा क्रिया के पहले आएगा। इसलिए किसी वाक्य में यदि आपको कर्मकारक की पहचान करनी हो, तो क्रिया के पहले किसको या क्या, प्रश्न लगाकर देखिए तो आपको कर्मकारक मिल जाएगा।

जैसे पहले वाक्य में, यदि कर्मकारक की पहचान करनी है, तो क्रिया यानी डांटा, के पहले किसको लगाकर देखिए,

पिताजी ने किसको डांटा? आपको उत्तर मिलेगा मनोज, तो यहां पर मनोज कर्मकारक है।

करण कारक

कारक का तीसरा भेद हैं, करण कारक। इसकी परिभाषा इस प्रकार है कि, किसी क्रिया के संपन्न होने के लिए आवश्यक साधन को करणकारक कहते हैं। दूसरे शब्दों में, जिसके द्वारा क्रिया पूरी होती हैं, उस साधन को करण कारक कहते हैं। किसी वाक्य में प्रयुक्त से, के द्वारा या के साथ, इन विभक्ति चिन्हों को करण कारक कहते हैं।

उदाहरण के लिए,

1 राजू ने गाय को रस्सी से बांध दिया।

2 ममता ने माया को चम्मच के द्वारा खीर खिलाई।

इन वाक्यों में क्रमशः रस्सी से, तथा चम्मच के द्वारा, इन दोनों की सहायता से कार्य संपन्न हो रहा है, इसलिए ये दोनों विभक्ति चिह्न करण कारक कहलाते हैं।

संप्रदान कारक

संप्रदान कारक की परिभाषा बहुत आसान है, कि जिसके लिए कार्य या क्रिया की जा रही है, उसे संप्रदान कारक कहते हैं। किसी वाक्य में प्रयुक्त “के लिए” यह विभक्ति चिह्न संप्रदान कारक होता है। कई जगहों पर “को” का भी प्रयोग होता है। उदाहरण के लिए,

1 मां ने गीता के लिए किताबें खरीदी।

2 मोहन ने सुनील को घड़ी दी।

3 पिताजी मेरे लिए गुड़िया लेकर आए।

4 सुरेश ने अपने भाई को गाड़ी खरीद कर दी।

5 राधा ने पानी भरने के लिए मटका खरीदा।

इन वाक्यों में, क्रमशः गीता के लिए, सुनील को, मेरे लिए, भाई को तथा पानी भरने के लिए, यह सभी विभक्ति चिह्न करण कारक कहलाएंगे।

अपादान कारक

अपादान का शाब्दिक अर्थ होता है विभाजित होना। इसलिए, वाक्य में प्रयुक्त जिन संज्ञा या सर्वनाम शब्दों से अलग होने या अलग करने का बोध होता है, उन विभक्ति चिन्हों को अपादान कारक कहते हैं। इसका विभक्ति चिह्न भी से है, लेकिन करण कारक में से का अर्थ है सहायता से, और यहां से का अर्थ है में से अलग होना।  उदाहरण के लिए,

1 रीना के हाथ से फूल नीचे गिर गए।

2 दादी चावल में से कंकड चुन रही है।

3 पेड़ों से फल गिर रहे हैं ‌।

इन वाक्यों में, हाथ से, चावल में से और पेड़ों से ये सभी विभक्ति चिह्न अपादान कारक है, क्योंकि इन सभी से विभक्त होने या अलग होने का भाव स्पष्ट हो रहा है।

अधिकरण कारक

वाक्य में प्रयुक्त जिस संज्ञा या सर्वनाम शब्द से, किसी व्यक्ति या वस्तु के आधार मिलने या आधार होने का बोध होता है, उसे अधिकरण कारक कहते हैं। दूसरे शब्दों में हम यह भी कह सकते हैं कि, जिन जिन संज्ञा या सर्वनाम शब्दों से, क्रिया के समय, स्थान आदि का ज्ञान होता है, उन्हें अधिकरण कारक कहते हैं।

इसे “में, पर, के साथ, के बीच, के उपर, के नीचे, के अंदर इत्यादि  विभक्ति चिन्हों के द्वारा पहचाना जाता है।

उदाहरण के लिए,

1 रेल पटरी पर दौड़ती है।

2 जितेन्द्र घर में आराम कर रहा है।

इन दोनों वाक्यों में क्रमशः, पटरी पर तथा घर में, यह दोनों विभक्ति चिह्न अधिकरण कारक कहलाएंगे।

संबंध कारक

वाक्य में प्रयुक्त जिन संज्ञा या सर्वनाम शब्दों से, किसी एक वस्तु का संबंध, दूसरी वस्तु के साथ होने का पता चलता है, वह संबंध कारक कहलाता है। संबंध कारक के विभक्ति चिह्न होते हैं, का, के, की इत्यादि।

उदाहरण के लिए,

1 चाय का कप टेबल पर रखा है।

2 अलमारी में कपड़ों का ढेर लगा हैं।

पहले वाक्य में, चाय का कप और टेबल दोनों संज्ञा शब्द हैं जिनका आपस में संबंध दिखाई देता है। क्योंकि चाय का कप कहां रखा है, टेबल पर। इसी तरह दूसरे वाक्य में, अलमारी और कपड़ों का ढेर, इन संज्ञा शब्दों में आपसी संबंध है। इसलिए ये सभी संबंध कारक है।

संबोधन कारक

किसी भी वाक्य में, जिन संज्ञा या सर्वनाम शब्दों से किसी को संबोधित करने , बुलाने या पुकारने का बोध होता है, उन्हें संबोधन कारक कहते हैं। यह हमेशा वाक्य की शुरुआत में ही आते हैं और इनके साथ संबोधन चिन्ह (!) लगा होता है। इनके विभक्ति चिह्न हैं – हे, अरे, ओह, ओ इत्यादि। कभी कभी किसी व्यक्ति के नाम को भी जोर से संबोधित करके संबोधन किया जाता है। उदाहरण के लिए,

1 हे भगवान! इस मूर्ख को थोड़ी बुद्धि दिजिए।

2 अरे! ये तुम क्या अनर्थ कर रहे हो?

3 ओ मेरे भाई! जरा ध्यान से गाड़ी चलाओ।

4 ओह! ये तो बहुत बुरा हुआ।

5 लीना! इतनी रात को कहां जा रही हो तुम?

इन सभी वाक्यों में क्रमशः, हे भगवान, अरे, ओ, ओह ये सभी विभक्ति चिह्न हैं। लीना इस नाम को जोर देकर बोला गया है और संबोधन कारक के रुप में उपयोग किया गया है।

FAQ

घर से कौन सा कारक है?

घर से एक अपादान कारक हैं।

मेरी कौन सा कारक है?



मेरी लड़की कौन है वाक्य में मेरी कौन सा कारक है?

मेरी वाक्य में संबंध कारक हैं।

कारक के कितने भेद होते हैं ?

कारक के ८ (आठ) भेद होते हैं।

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